Sunday, 23 November 2025

,,,,soch,,,

तुमने सोचा,
मैं कोई ख़्वाब सी 
जो बुझी हुई आंखों में
देगी सुकून 
मैंने सोचा 
मैं बनूं 
खारे पानी की झील,
जो तुम्हारे आंखों से बह कर
होठों तक सिमट रही
तुमने सोचा,
मैं खिलखिलाती सरसों
वसंत का एहसास लेकर 
जीवन को तुम्हारे रंगीन करूं
मैंने सोचा मैं बनूं उस खाद़ सी
सालों तक जिनसे फ़सलें ऊपजती रहीं!

~ प्रज्ञा

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